फोर्टिस ग्रुरुग्राम में 27 वर्षीय विदेशी मरीज की पीठ से 16.7 किलोग्राम वज़न के ट्यूमर को एक चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया की मदद से निकालने में मिली सफलता

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फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम ने मेडिकल उत्कृष्टता और टीमवर्क का शानदार परिचय देते हुए, 27 वर्षीय मरीज के शरीर से 16.7 किलोग्राम वज़न और 58×50 से.मी. आकार का गैर-कैंसरकारी ट्यूमर सफलतापूर्वक निकाला है। पैसिफिक आइलैंड्स से इलाज के लिए भारत आए इस मरीज के शरीर में 2008 से यह ट्यूमर था। डॉ निरंजन नायक, सीनियर डायरेक्टर तथा डॉ सुशील कुमार जैन, एडिशनल डायरेक्टर, सर्जिकल ओंकोलॉजी, फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के नेतृत्व में डॉक्टरों की एक कुशल टीम ने मरीज की पीठ में पनप रहे इस विशाल आकार के ट्यूमर को निकाला। यह ट्यूमर मरीज की पीठ पर एक बोरे की तरह लटका हुआ था।
मरीज इलाज के लिए अन्य देशों के अस्पतालों में भी जा चुके थे लेकिन ट्यूमर के साइज़ और इस मामले की जटिलता के चलते हर जगह सर्जरी से इंकार कर दिया गया। फोर्टिस गुरुग्राम में उनकी विस्तृत जांच के बाद, दो चरणों में सर्जरी की तैयारी की गई। पहले चरण में, 11 महत्वपूर्ण ब्लड वैसल्स को ब्लॉक किया गया ताकि ट्यूमर रिमूवल की प्रक्रिया के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव नहीं हो।
ट्यूमर में कई बड़े आकार की आर्टरी और वेन्स मौजूद थीं, और ट्यूमर ने मरीज की पूरी पीठ को ढक रखा था, इस तरह उनके शरीर का करीब 18% हिस्सा ही एक्सपोज्ड (रॉ एरिया) था। इतने बड़े भाग को सर्जरी के बाद कवर करना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। यदि डॉक्टर उनकी दोनों जांघों से हैल्दी स्किन लेकर स्किन ग्राफ्ट करते तो कुल एक्सपोज़्ड हिस्सा बढ़कर करीब 35-36% तक हो जाता, जिससे मुश्किल बढ़ सकती थी। इससे बचने के लिए, सर्जन्स ने ट्यूमर से ही ग्राफ्ट लेने का फैसला किया क्योंकि यह गैर-कैंसरकारी था। इस इनोवेटिव एप्रोच के चलते मरीज की पूरी पीठ को ट्यूमर से ही स्किन ग्राफ्ट लेकर कवर किया गया। यह पूरी प्रक्रिया करीब 10 घंटे तक चली, और मरीज को चार दिन बाद ही स्थिर अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

डॉ निरंजन नायक, सीनियर डायरेक्टर, सर्जिकल ओंकोलॉजी, फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट, गुरुग्राम ने कहा, “जायंट न्यूरोफाइब्रोमा एक प्रकार का पेरिफेरल नर्व ट्यूमर है जिससे त्वचा के ऊपर व नीचे नरम उभार पैदा करता है और यह धीरे-धीरे बढ़ता रहता है। आमतौर पर जेनेटिक असामान्यताओं की वजह से यह ट्यूमर पनपता है। धीरे-धीरे इसकी वजह से मोबिलिटी पर असर पड़ता है, यह शारीरिक विकृति और असहजता या पीड़ा का भी कारण बनता है। कभी-कभी इसकी वजह से मरीज के शरीर में घाव भी हो जाते हैं जिनसे खून रिसने लगता है। इनमें से कुछ ट्यूमर कई बार कैंसर में बदल सकते हैं (मैलिगनेंट) और शरीर के अन्य भागों में फैलना शुरू कर देते हैं। ये ट्यूमर वास्क्युलर होते हैं जिनमें बड़ी मात्रा में खून का प्रवाह भी होता रहता है। यही कारण है कि इस प्रकार के ट्यूमर की सर्जरी करना खतरे से खाली नहीं होता क्योंकि कई बार अनियंत्रित रक्तस्राव होने लगता है। इसके अलावा, किसी महत्वपूर्ण अंग के नज़दीक होने पर और सर्जरी के बाद इस प्रभावित हिस्से को कवर करना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता। इस प्रकार की सर्जरी के लिए काफी तालमेल के साथ अलग-अलग टीमों को काम करना होता है और जटिल किस्म की प्रीऑपरेटिव, इंट्राऑपरेटिव तथा पोस्टऑपरेटिव मैनेजमेंट रणनीतियों की आवश्यकता होती है।इस मामले में, चूंकि ट्यूमर नॉन-कैंसरस था, मरीज को सर्जरी के बाद स्वास्थ्यलाभ का तेजी से लाभ मिला और वह लंबे समय तक अच्छा जीवन बिता सकते हैं।”

महिपाल सिंह भनोत, बिजनेस हैड, फोर्टिस हॉस्पीटल गुरुग्राम ने कहा, “ट्यूमर के साइज़ और वज़न के मद्देनज़र यह मामला काफी चुनौतीपूर्ण था। लेकिन इसके बावजूद, हमारी मल्टीडिसीप्लीनरी टीम ने, जिसका नेतृत्व डॉ निरंजन नायक कर रहे थे, पूरी कुशलता के साथ इस मामले को संभाला। मैं सर्जिकल ओंकोलॉजी, इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी, प्लास्टिक सर्जरी, एनेस्थीसिया, ओटी स्टाफ, आईसीयू, नर्सिंग, न्यूक्लियर मेडिसिन, रेडियोलॉजी, पैथोलॉजी, तथा ब्लड बैंक सर्विसेज़ समेत पूरी टीम का आभारी हूं। उनके सामूहिक प्रयासों से ही इस जटिल मामले में कामयाबी हासिल हुई है। इस तरह की चुनौतीपूर्ण और जटिल स्थितियों में सभी टीमों के समन्वित प्रयासों की आवश्यकता होती है।”