फिल्म ‘श्रीकांत’

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फिल्म  रिव्यू

कलाकार           राजकुमार राव , ज्योतिका , अलाया एफ , शरद केलकर और जमील खान आदि
लेखक              जगदीश सिद्धू और सुमित पुरोहित
निर्देशक            तुषार हीरानंदानी
निर्माता             भूषण कुमार और निधि परमार हीरानंदानी

रेटिंग               2.5/5

अभिनय के लिहाज से ये फिल्म राजकुमार राव की यादगार फिल्म हो सकती थी, अगर राजकुमार ने दृष्टिहीनों को दैनिक जीवन में आने वाली दिक्कतों को इस फिल्म में जीकर दिखाया होता। दिन के जरूरी काम निपटाने में आने वाली समस्याएं किसी दृष्टिहीन किरदार से दर्शकों को जोड़ने का सबसे आसान और सशक्त माध्यम बनती हैं,पूरा फोकस श्रीकांत की पढ़ाई, उसकी कारोबारी सफलता और फिर एक सफल कारोबारी को खुद पर होने वाले अभिमान पर केंद्रित है।श्रीकांत बोल्ला दिल का सच्चा इंसान है लेकिन जिद्दी है। वह शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ कोर्ट तक जाता है ताकि इंटरमीडिएट में उसे विज्ञान विषयों के साथ पढ़ने की अनुमति मिले। वह जीतता भी है। देश के सबसे प्रसिद्ध इंजीनियरिंग कॉलेज आईआईटी में उसे प्रवेश नहीं मिलता है लेकिन दुनिया के सबसे मशहूर तकनीकी विश्वविद्यालय यानी अमेरिका के एमआईटी में उसे निशुल्क शिक्षा के साथ प्रवेश मिलता है। उसकी कामयाबी की दास्तान पढ़कर यहां डॉक्टरी की एक छात्रा वीरा स्वाति उससे प्रभावित होती है। वही अमेरिका में श्रीकांत से मिलने पर उसे वापस स्वदेश जाने के लिए प्रेरित करती है। यहां तक की कहानी बहुत ही रोचक, भावुक और सजल कर देने वाली है। फिर श्रीकांत कामयाब होता है। उसके अंदर अहंकार आता है। अपनी ही मदद करने वाले रवि को वह बार बार जलील करता है, लेकिन दोस्त है कि ‘आपदगतिम् च न जहाति ददाति काले’ का अनुसरण करता हुआ संतों के बताए मित्रों के लक्षणों पर सौ फीसदी खरा उतरता है।

फिल्म खत्म होने के बाद जब स्क्रीन पर ये लिखकर आता है कि श्रीकांत बोल्ला आज भी अपनी इस ख्वाहिश के साथ जी रहे है तो फिल्म का मकसद साफ हो जाता है। फिल्म की कहानी श्रीकांत बोल्ला के जन्म से शुरू होती है, जब उसका पिता लोगों की ये सलाह मानकर अपने बेटे को दफनाने पहुंच जाता है कि इसे अभी मार दो नहीं तो जीवन भर ये कष्ट में रहेगा और माता-पिता को भी कष्ट देता रहेगा। पिता उसका नाम क्रिकेटर कृष्णामाचारी श्रीकांत के नाम पर रखता है और वह बड़ा होकर क्रिकेट खेलता भी है।