चौथे स्तंभ के सदस्यों के लिए संदेश: डॉ. सुभाष चंद्रा

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मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है, लेकिन शासक वर्ग, चाहे वह विधायिका हो, कार्यपालिका हो, कॉर्पोरेट हो या कोई और, उन सबसे मीडिया पर दबाव बढ़ता जा रहा है। सरकारें विज्ञापन के प्रभाव या राज्य मशीनरी के इस्तेमाल के ज़रिए मीडिया पर दबाव डालती हैं ताकि प्रेस को तथ्यात्मक जानकारी प्रकाशित करने से रोका जा सके।

ज़ी मीडिया के प्रमुख चैनल – ज़ी न्यूज़ को हाल ही में मीडिया की स्वतंत्रता के सरकारी दमन की एक भयावह घटना का सामना करना पड़ा। ज़ी न्यूज़ के एक वरिष्ठ पत्रकार ने 23 मई, 2024 को दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल का एक साक्षात्कार किया था। साक्षात्कार के बाद, ज़ी मीडिया की स्वतंत्र संपादकीय टीम ने बातचीत में कुछ आपत्तिजनक सामग्री को ध्यान में रखते हुए इसे प्रसारित नहीं करने का फैसला किया। जल्द ही पता चला कि पंजाब सरकार ने किसी एक मल्टीपल सिस्टम ऑपरेटर (एमएसओ) के एकाधिकार के स्थिति का लाभ उठाते हुए पूरे राज्य में ब्लैकआउट कर दिया। ब्लैकआउट केवल ज़ी न्यूज के लिए ही नहीं, बल्कि ज़ी पीएचएच और ज़ी दिल्ली एनसीआर के लिए भी किया गया था। यह राजनीतिक दलों द्वारा चौथे स्तंभ के रूप में हमें दबाने का वास्तविक समय पर आधारित और जीवंत उदाहरण है।

मैं न केवल लोकतांत्रिक समाज में स्वतंत्र प्रेस के महत्व को स्वीकार करता हूं, बल्कि उस पर गर्व भी करता हूं और पत्रकारिता की स्वतंत्रता को दबाने के किसी भी प्रयास की निंदा करता हूं। शासक वर्ग आपातकाल के बाद श्रीमती इंदिरा गांधी की हार को भूल गया है।गौरतलब है कि 3 मई 2024 को, जिसे हर साल विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है, उस दिन मैंने प्रेस की स्वतंत्रता पर अपने विचार और दृष्टिकोण व्यक्त करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया। ज़ी मीडिया ने हमेशा अपने काम करने के तरीकों और मूल मूल्यों के माध्यम से अन्य मीडिया संगठनों के लिए एक उदाहरण स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। इसकी प्रतिबद्धता को उजागर करने वाले मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

1.सरकार को सच्चाई के बारे में निडरता से जानकारी देना।

2.सार्वजनिक मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित करना, चाहे उन्हें सरकार की आलोचना के रूप में ही क्यों नहीं देखा जाए।

3.अनुचित दबाव डालने की कोशिश करने वाली किसी भी सरकार को बेनकाब करने के लिए अपने राष्ट्रव्यापी नेटवर्क     का उपयोग करना, इसे पूरे देश में एक अभियान में बदल देना, बशर्ते हम सभी एकजुट हों।

4.पत्रकारों को हमेशा दबाव से निपटने और दबाव में ईमानदारी बनाए रखने का प्रशिक्षण देना।

5.यदि आवश्यक हो, तो प्रेस की स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जनहित याचिका के रूप में मुकदमा दायर करना और कानूनी उपाय अपनाना।

डॉ. सुभाष चंद्र