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सीने में दर्द का इंतजार क्यों? विशेषज्ञों ने बिना लक्षण वाली हृदय बीमारी की जल्द पहचान और आधुनिक इमेजिंग से शुरुआती जोखिम पता लगाने पर दिया जोर

हृदय में होने वाले शुरुआती बदलाव कई बार लक्षण दिखाई देने से पहले ही शुरू हो जाते हैं। ऐसे में सीने में दर्द या सांस फूलने जैसे लक्षणों का इंतजार करने के बजाय आधुनिक कार्डियक इमेजिंग के माध्यम से हृदय संबंधी जोखिमों की समय रहते पहचान करना जरूरी है। ECHO ASIA / ECHO INDIA 2026 में विशेषज्ञों ने बिना लक्षण वाली हृदय बीमारी, स्टेज बी हार्ट फेल्योर, मधुमेह से जुड़े हृदय जोखिम और कार्डियक इमेजिंग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते इस्तेमाल पर चर्चा की।

दुनियाभर में हृदय रोग का बढ़ता बोझ इसकी समय रहते पहचान की जरूरत को और महत्वपूर्ण बनाता है। अक्टूबर 2026 में जारी विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक नई रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2023 में इस्केमिक हार्ट डिजीज के कारण दुनिया भर में लगभग 95 लाख लोगों की मौत हुई, जिससे यह दुनियाभर में मौत का सबसे बड़ा एकल कारण रहा।

भारत में भी हृदय रोग मृत्यु के प्रमुख कारणों में शामिल है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) के 2026 के आंकड़ों के अनुसार, भारत में कुल मौतों में हृदय और रक्त वाहिकाओं से जुड़ी बीमारियों की हिस्सेदारी 28.1% है। इस बोझ में इस्केमिक हार्ट डिजीज और स्ट्रोक का योगदान लगभग 80% है। ECHO ASIA / ECHO INDIA 2026 का आयोजन 8 से 11 अक्टूबर तक गुरुग्राम स्थित द लीला एंबिएंस में किया जा रहा है। इसका आयोजन एशियन-पैसिफिक एसोसिएशन ऑफ इकोकार्डियोग्राफी (AAE) और इंडियन एकेडमी ऑफ इकोकार्डियोग्राफी (IAE) द्वारा “Shaping the New Era of Cardiac Imaging” थीम के तहत किया जा रहा है। भारत और एशिया-प्रशांत क्षेत्र के विशेषज्ञ इस सम्मेलन में कार्डियक इमेजिंग, शोध और नई तकनीकों पर चर्चा कर रहे हैं।

बिना लक्षण के भी शुरू हो सकती है हृदय बीमारी –

कई मरीजों में हृदय की संरचना या उसके काम करने के तरीके में बदलाव उस समय भी शुरू हो सकते हैं, जब कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देता। कार्डियक इमेजिंग इन शुरुआती बदलावों को पहचानने और भविष्य में होने वाले जोखिम को बेहतर तरीके से समझने में मदद कर सकती है।

डॉ. राकेश गुप्ता, एग्जीक्यूटिव ऑर्गनाइजिंग प्रेसिडेंट, इंडियन एकेडमी ऑफ इकोकार्डियोग्राफी (IAE) ने कहा, “हृदय रोग के मामले में लक्षणों का इंतजार करना हमेशा सही तरीका नहीं है। कई लोगों में हृदय में शुरुआती बदलाव बिना किसी स्पष्ट परेशानी के विकसित हो सकते हैं और मरीज लंबे समय तक इससे अनजान रह सकता है। आधुनिक इमेजिंग तकनीकें हृदय की संरचना और उसके काम करने के तरीके में हो रहे बदलावों को शुरुआती स्तर पर पहचानने में मदद कर सकती हैं। खासतौर पर उन लोगों के लिए यह महत्वपूर्ण है, जिनमें पहले से हृदय रोग के जोखिम मौजूद हैं।

स्टेज बी हार्ट फेल्योर: लक्षण आने से पहले बीमारी की पहचान:स्टेज बी हार्ट फेल्योर में मरीज को आमतौर पर हार्ट फेल्योर के स्पष्ट लक्षण नहीं होते, लेकिन हृदय की संरचना या उसके काम करने के तरीके में बदलाव शुरू हो चुके होते हैं। सम्मेलन में इन बदलावों की शुरुआती पहचान और भविष्य के जोखिम का आकलन करने पर विशेष जोर दिया गया।

डॉ. हंसा गुप्ता, चेयरमैन, साइंटिफिक कमेटी, IAE ने कहा, “स्टेज बी हार्ट फेल्योर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस चरण में मरीज को अक्सर कोई खास लक्षण महसूस नहीं होता, जबकि हृदय में बदलाव शुरू हो चुके होते हैं। इकोकार्डियोग्राफी और स्ट्रेन इमेजिंग जैसी जांचें हृदय की कार्यक्षमता में हो रहे शुरुआती बदलावों को पहचानने और समझने में मदद कर सकती हैं। इस स्तर पर जोखिम की पहचान होने से मरीज की बेहतर निगरानी की जा सकती है और समय रहते इलाज शुरू किया जा सकता है। जीवनशैली में बदलाव और उचित उपचार से बीमारी के आगे बढ़ने के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।”

मधुमेह का असर सिर्फ ब्लॉकेज तक सीमित नही-विशेषज्ञों ने कहा कि मधुमेह का हृदय पर असर केवल कोरोनरी धमनियों में ब्लॉकेज तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक ब्लड शुगर बढ़ा रहने से हृदय की मांसपेशियों की संरचना और कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। इसे डायबिटिक कार्डियोमायोपैथी कहा जाता है। इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत में लगभग 8.98 करोड़ वयस्क डायबिटीज के साथ रह रहे थे और वयस्कों में इसका अनुमानित प्रसार 10.5% था।

डॉ. जे ओह, इंटरनेशनल चेयरमैन, IAE ने कहा, “मधुमेह और हृदय रोग का आपस में गहरा संबंध है और भारत में मधुमेह का बोझ बहुत बड़ा है। मधुमेह धीरे-धीरे शरीर के अलग-अलग अंगों को प्रभावित करता है और हृदय भी इससे अछूता नहीं है। कई मामलों में मरीज को सीने में दर्द या सांस लेने में परेशानी नहीं होती, लेकिन हृदय की मांसपेशियों में बदलाव शुरू हो चुके होते हैं। इसलिए मधुमेह की देखभाल केवल ब्लॉकेज की जांच तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इमेजिंग की मदद से हृदय की संरचना और उसकी कार्यक्षमता में होने वाले बदलावों को शुरुआती स्तर पर समझने में मदद मिल सकती है। लंबे समय से मधुमेह से पीड़ित लोगों, खासकर जिनमें अन्य जोखिम कारक भी मौजूद हैं, उन्हें नियमित हृदय जांच को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।”

इकोकार्डियोग्राफी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती भूमिका- सम्मेलन में इकोकार्डियोग्राफी और कार्डियक इमेजिंग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों के अनुसार, AI डॉक्टरों को इमेज का विश्लेषण करने, जरूरी माप लेने और कुछ असामान्य बदलावों की पहचान करने में मदद कर सकता है। सम्मेलन के वैज्ञानिक कार्यक्रम में हृदय की संरचना से जुड़ी इमेजिंग और इकोकार्डियोग्राफी में AI के व्यावहारिक इस्तेमाल पर भी सत्र शामिल हैं।

डॉ. एस. के. पराशर, इंटरनेशनल चेयरमैन, IAE ने कहा, “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उद्देश्य डॉक्टरों की जगह लेना नहीं, बल्कि उनकी मदद करना है। इकोकार्डियोग्राफी में AI इमेज का विश्लेषण करने, जरूरी माप लेने और कुछ असामान्य बदलावों की पहचान करने में मदद कर सकता है। आने वाले समय में यह जांच की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और तेज बनाने के साथ-साथ ऐसे शुरुआती बदलावों की पहचान में भी मदद कर सकता है, जिन्हें सामान्य जांच के दौरान पहचानना कभी-कभी मुश्किल होता है। हालांकि, AI केवल एक सहायक तकनीक है। अंतिम निर्णय हमेशा डॉक्टर को मरीज की पूरी स्थिति, लक्षणों और अन्य जांचों को ध्यान में रखते हुए लेना चाहिए।”

डॉ. एच. के. चोपड़ा, नेशनल चेयरमैन, IAE ने कहा, “हमें यह समझने की जरूरत है कि मरीज के गंभीर अवस्था में पहुंचने से पहले उसके हृदय में क्या बदलाव हो रहे हैं। इमेजिंग हमें इस दिशा में एक महत्वपूर्ण जानकारी दे सकती है। अब बड़ी चुनौती यह है कि इस जानकारी और तकनीक का लाभ विशेषज्ञ केंद्रों से आगे बढ़ाकर देश की आम आबादी तक कैसे पहुंचाया जाए।”शुरुआती पहचान के लिए गैर-आक्रामक और बिना विकिरण वाली इमेजिंग पर जोर-डॉ. कपिल खन्ना, प्रेसिडेंट, इंडियन एसोसिएशन ऑफ क्लिनिकल कार्डियोलॉजिस्ट्स (IACC) ने कहा, “इकोकार्डियोग्राफी में काफी बदलाव आया है। यह केवल बीमारी की पहचान करने वाली जांच नहीं रह गई है। यह एक गैर-आक्रामक जांच है, इसमें रेडिएशन नहीं होता, जरूरत पड़ने पर इसे दोहराया जा सकता है और इससे ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है, जो डॉक्टरों को इलाज के साथ-साथ बीमारी के संभावित भविष्य को समझने में भी मदद करती है।

ECHO ASIA / ECHO INDIA 2026 का आयोजन 11 अक्टूबर तक चलेगा। सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य कार्डियक इमेजिंग, शोध और नई तकनीकों को आगे बढ़ाना है, ताकि हृदय संबंधी जोखिमों की पहचान पहले की जा सके और मरीजों के बेहतर प्रबंधन में मदद मिल सके।

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