कसाब को फांसी दिलाने की कानूनी लड़ाई में राजकुमार राव ने मारी बाजी मूवी रिव्यू: प्रहार – द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्जवल निकम

श्रेणी:Hindi, Biopic, Thriller, Drama
फिल्म की कहानी क्या है?
कहानी देश के जाने-माने सरकारी वकील उज्ज्वल निकम (राजकुमार राव) से शुरू होती है, जिनकी जिंदगी अदालत, जटिल मुकदमों और न्याय दिलाने की जिद के इर्द-गिर्द सिमटी है। अपने पेशे के प्रति इसी जुनून की कीमत उन्हें निजी जिंदगी में चुकानी पड़ती है। पत्नी (वामिका गब्बी), बेटे और बेटी को समय न दे पाने वाले निकम उस वक्त बेटी की शादी की जिम्मेदारियां निभा रहे होते हैं, जब मुंबई पर 26/11 का भयावह आतंकी हमला होता है। हमले के दौरान पकड़े गए एकमात्र जीवित आतंकवादी अजमल कसाब (ललित प्रभाकर) के खिलाफ मुकदमा लड़ने की चुनौती अब निकम के सामने है। सरकारी वकील उज्ज्वल निकम (राजकुमार राव) ने कोर्टरूम में यह कानूनी लड़ाई लड़ी थी। कसाब कभी अपने मुंबई आने की वजह कुछ और बताता, तो कभी अपनी उम्र को लेकर झूठ बोलता और कहता कि वह 18 साल का नहीं है, ऐसे में कहानी और पेचीदा होती जाती है। उज्जवल निकम की जिंदगी अदालत के इर्द-गिर्द घूमती है और इसके चलते वह कहीं न कहीं अपने परिवार से दूर हो गए हैं, यह भी इस कहानी में दिखाया गया है। फिल्म में वामिका गब्बी उनकी पत्नी का रोल निभा रही हैं। वहीं बचाव पक्ष के वकील अब्बास काजमी (सिकंदर खेर) हैं। उज्जवल निकम अपने कर्तव्य और परिवार के बीच संतुलन बनाकर कैसे कसाब को फांसी तक पहुंचाते हैं, यह कहानी इसी के इर्द-गिर्द घूमती है।
‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्जवल निकम’ मूवी रिव्यू
अविनाश अरुण का संयमित निर्देशन और थ्रिलर अंदाज दिलचस्पी बनाए रखते हैं। हालांकि, उज्ज्वल निकम की निजी जिंदगी का ट्रैक कई बार कोर्टरूम ड्रामा की रफ्तार धीमी करता है, लेकिन शीर्षक के अनुरूप यह उनके पेशेवर कर्तव्य और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच की कशमकश भी सामने लाता है। अन्य कोर्टरूम ड्रामा फिल्मों की तरह निर्देशक यहां लाउड होने से बचे हैं। दस साल की बच्ची की गवाही, कसाब का इकबालिया बयान और निकम की क्लोजिंग स्पीच जैसे दृश्य गहरी छाप छोड़ते हैं।
फिल्म 26/11 के पीड़ितों और अपनी जान कुर्बान करने वाले रक्षकों के जख्मों पर मरहम बनने का काम करती है। हालांकि, निकम की कानूनी रणनीति को और गहराई से उभारा जा सकता था और संगीत पर बेहतर काम की गुंजाइश थी।
इन कमियों के बावजूद, ‘प्रहार’ एक परिपक्व नजरिया पेश करती है। यह याद दिलाती है कि आतंक कितना भी भयावह हो और जनभावनाएं कितनी भी उग्र, न्याय की असली ताकत बदले में नहीं, बल्कि निष्पक्ष सुनवाई और संविधान के प्रति प्रतिबद्धता में है। आखिरकार, आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई सिर्फ अपराधी को सजा दिलाने की नहीं, बल्कि उसे उसके गुनाहों का अहसास दिलाने के साथ-साथ उन लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने की भी है, जो भारत की असली ताकत हैं। इन सब के बीच, कसाब के किरदार में ललित प्रभाकर फिल्म का सरप्राइज पैकेज हैं। उनका सधा हुआ, बेचैन कर देने वाला अभिनय दर्शक को असहज करने में सफल रहता है। सहायक भूमिकाओं में अजिंक्य देव, आशीष विद्यार्थी, ऋत्विक साहोर, नासिर और पुलिसकर्मियों की भूमिकाएं निभाने वाले कलाकार भी अपने प्रभावशाली अभिनय से कहानी को विश्वसनीयता और गहराई देते हैं।



