झारखंड से मिला संदेश- नीतीश-बीजेपी एक दूसरे के लिए जरूरी भी, मजबूरी भी

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नीतीश कुमार को भरोसा था कि वो झारखंड में खुद की बदौलत दो चार सीट ले आएंगे इसलिए उन्होंने यहां बीजेपी से गठबंधन नहीं करना ही ठीक माना. हालांकि, नीतीश कुमार ने राज्य में कोई चुनाव प्रचार नहीं किया था लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने वहां खूब पसीना बहाया था.

  • 2017 के बाद पांचवें राज्य में बीजेपी ने गंवाई सत्ता
  • झारखंड चुनाव में जेडीयू का प्रदर्शन निराशाजनक

झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं और साल 2017 के बाद यह पांचवां राज्य है जहां बीजेपी अपनी सत्ता नहीं बचा पाई. हार के कारणों को देखें तो ये माना जा सकता है कि अगर बीजेपी अपने सहयोगियों के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ती तो नतीजे बेहतर हो सकते थे. वोट शेयर को देखें तो बीजेपी और आजसू का वोट शेयर महागठबंधन (जेएमएम, कांग्रेस, आरजेडी) से ज्यादा है. इस विधानसभा चुनाव में जो सबसे चौंकाने वाली बात रही वो है बिहार की सत्ताधारी पार्टी जेडीयू का निराशाजनक प्रदर्शन.

चूंकि झारखंड बिहार से अलग होकर ही एक नया राज्य बना था इसलिए बिहार के प्रमुख दलों का वहां भी प्रभाव माना जाता है, लेकिन बीजेपी से अलग होकर जिस तरह से जेडीयू ने वहां चुनाव लड़ा और जो चुनाव परिणाम सामने आए वो निश्चित तौर पर नीतीश कुमार के लिए एक बड़ा झटका है.

जेडीयू को मात्र 0.73% वोट मिले

झारखंड विधानसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड के किसी उम्मीदवार का जीतना तो दूर पार्टी के लिए एक फीसदी वोट लाना भी मुश्किल हो गया. जेडीयू को मात्र 0.73% वोट मिले. इससे ज्यादा वोट तो नोटा (1.36%) और असदुद्दीन की पार्टी AIMIM (1.166%) को मिले हैं. इसी से आप जेडीयू के प्रदर्शन का अंदाजा लगा सकते हैं. बता दें कि नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) ने झारखंड की 81 सीटों में से 31 सीटों पर चुनाव लड़ा था. झारखंड जेडीयू के अध्यक्ष सालखन मुर्मू तक जीत दर्ज नहीं कर पाए. जेडीयू ने एक रणनीति के तहत आदिवासी चेहरे सालखन मुर्मू को प्रदेश की बागडोर सौंपी थी. मुर्मू खुद मझगांव ( 9 वें नंबर पर 1889 वोट) और शिकारीपाड़ा ( तीसरे नंबर पर 4445 वोट) से प्रत्याशी थे और दोनों जगह बुरी तरह चुनाव हार गए. हालांकि जेडीयू के सभी उम्मीदवारों में सबसे ज्यादा वोट उन्हें ही मिले हैं.

चूंकि नीतीश कुमार को भरोसा था कि वो झारखंड में खुद की बदौलत दो-चार सीट ले आएंगे इसलिए उन्होंने यहां बीजेपी से गठबंधन नहीं करना ही ठीक माना. हालांकि नीतीश कुमार ने राज्य में कोई चुनाव प्रचार नहीं किया था लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने वहां खूब पसीना बहाया था. नीतीश कुमार के राष्ट्रीय अध्यक्ष होने की वजह से झारखंड में बेहद खराब प्रदर्शन के लिए कार्यकर्ता से लेकर बिहार में सहयोगी पार्टी बीजेपी भी उन्हें ही जिम्मेदार ठहरा रही है.

नीतीश कुमार पर दबाव आना स्वाभाविक

बिहार में तो इसे लेकर राजनीति भी तेज हो गई है और नीतीश कुमार के कद को कम करने के लिए बीजेपी ने यह भी कहना शुरू कर दिया है कि यहां भी नीतीश की पार्टी को सीटें बीजेपी की वजह से ही मिलती है. ऐसे बयान के बाद नीतीश कुमार पर दबाव आना स्वाभाविक है. बिहार के नोखा विधानसभा सीट से पूर्व विधायक रह चुके बीजेपी के वरिष्ठ नेता, रामेश्वर चौरसिया ने कहा, ‘लोग एक ही चेहरे को बार-बार देखकर तंग आ गए हैं.’ ऐसा हर क्षेत्र में होता है. बिहार को भी नया चेहरा बनाने की जरूरत है.’

हालांकि जेडीयू महासचिव केसी त्यागी ने इसका विरोध किया और कहा कि कुछ चेहरों को जनता हमेशा चाहती ऐसे में चेहरा बदलने का सवाल ही नहीं उठता है. इस हार के बाद नीतीश कुमार के लिए बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव में खुद को बड़ा भाई दिखाना कठिन होगा.

यही हालत बिहार में बीजेपी की भी है. बीजेपी भी गठबंधन नहीं करने का परिणाम झारखंड में देख चुकी है इसलिए नीतीश कुमार और बीजेपी दोनों के लिए एक दूसरे का साथ जरूरी और मजबूरी दोनों है.

चूंकि बिहार में बीजेपी में ऐसा कोई नेता नहीं है जिसकी पूरे बिहार में स्वीकार्यता हो तो जेडीयू की दिक्कत यह है कि अकेले दम पर वो चुनाव लड़कर सरकार बनाने लायक सीट लाने की स्थिति में नहीं है. जेडीयू अपने बलबूते 100-125 सीटों पर ही प्रभावशाली साबित होती है.

नीतीश ने बीजेपी को सत्ता में भागीदार बनाया

नीतीश कुमार ने जब अगस्त 2017 में आरजेडी और कांग्रेस का साथ छोड़कर बीजेपी को सत्ता में भागीदार बनाया था तो उन्होंने दलील दी कि उन्होंने ऐसा अंतरात्मा की आवाज पर किया था क्योंकि वो भ्रष्टाचार से कोई समझौता नहीं कर सकते. बता दें कि उस वक्त लालू यादव और उनके डिप्टी सीएम रहे बेटे तेजस्वी के खिलाफ आईआरसीटीसी घोटाला मामले में सीबीआई और ईडी की टीम ने पटना में छापेमारी की थी जिस पर सीएम नीतीश कुमार ने तेजस्वी से सफाई मांगी थी.

नीतीश कुमार ने महागठबंधन टूटने का कारण भी यही बताया था. अब जो वर्तमान हालात हैं उसमें नीतीश कुमार दो राहे पर खड़े हैं. नीतीश कुमार न तो खुल कर बीजेपी के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और भारतीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) का खुलकर समर्थन कर सकते हैं और न ही खुलकर इसका विरोध करके बीजेपी से अपनी राहें अलग कर सकते हैं.

बिहार चुनाव में 10 महीने से भी कम समय

महागठबंधन छोड़ने के बाद से ऐसे ही लालू यादव की पार्टी आरजेडी ने उन्हें पलटू राम की संज्ञा दे रखी है ऐसे में उनके लिए वहां जाना भी अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता ही होगा और अगर वो बीजेपी के नीतियों का खुलकर समर्थन करते हैं तो विधानसभा चुनाव में उनके मुस्लिम वोट बैंक के छिटकने का खतरा है क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो वो सरकार बनाने लायक नंबर लाने में भी असफल हो सकते हैं.

अब जब बिहार विधानसभा चुनाव में 10 महीने से भी कम समय बचा है तो नीतीश कुमार के लिए आत्ममंथन और उनकी पार्टी की राजनीतिक हैसियत का आंकलन करने का वक्त आ गया है. यह भी देखना दिलचस्प होगा कि इन 10 महीनों में वो ऐसा क्या करते हैं जिससे उनकी धूमिल हो रही सुशासन बाबू की छवि को एक बार फिर वो चमका सकते हैं.

इन 10 महीनों में अगर उन्होंने खुद को मजबूत नहीं किया तो निश्चित तौर पर उन्हें विधानसभा चुनाव में बीजेपी के वो तेवर झेलने पड़ सकते हैं, जो महाराष्ट्र चुनाव में पार्टी ने शिवसेना को दिखाए थे.

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