साहित्य जगत

‘रंगलेयर रबी’ ने टैगोर की नाट्य-विरासत को फिर से चर्चा में ला दिया है।

वांडरर्स फुटप्रिंट्स ट्रैवल बुटीक और स्थापना शांतिनिकेतन की ओर से संयुक्त रूप से प्रस्तुत ‘रंगलय रबी’ (“जन-मंच के रबी”) का मंचन इस प्रोग्राम की रूपरेखा प्रकृति मुखोपाध्याय ने रबींद्रनाथ टैगोर और बंगाली पब्लिक थिएटर परंपरा के बीच के रिश्ते को समझने की उत्सुकता से तैयार की थी। इस प्रस्तुति को बैकस्टेज के किस्सों और गानों के आधार पर तैयार किया गया था। ये गाने और किस्से लगभग पच्चीस स्टेज अडैप्टेशन (मंच-रूपांतरण) में से चुने गए नाटकों पर आधारित थे—जिनमें टैगोर के अपने नाटक और उनकी कहानियों, उपन्यासों व कविताओं के मंच-रूपांतरण शामिल थे, जिन्हें पब्लिक थिएटर में मंचित किया गया था।

कार्यक्रम में बताया गया कि कैसे बंगाली पब्लिक थिएटर, जो उस समय की पुरुष-प्रधान और भेदभावपूर्ण राजनीति से प्रभावित था, टैगोर को उनकी असली कलात्मक भावना के साथ नहीं अपना सका। जिन नाटकों को मंच पर पेश किया गया, वे ज़्यादातर व्यावसायिक कारणों से चुने गए थे। टैगोर खुद पब्लिक थिएटर को लेकर बहुत उत्साहित नहीं थे; फिर भी, वे वहाँ मंचित अपने नाटकों के प्रदर्शन में शामिल होते थे। वे पब्लिक थिएटर की अभिनेत्रियों की अभिनय क्षमता का भी बहुत सम्मान करते थे और उनकी कलात्मक उत्कृष्टता की तारीफ़ करते थे।

कार्यक्रम का समापन आज के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में टैगोर के नाटकों की लगातार बनी हुई प्रासंगिकता पर विचार करते हुए हुआ—खासकर बदलते राजनीतिक माहौल को देखते हुए—और इस बात पर ज़ोर दिया गया कि आज के समय के हिसाब से उनके नाटकों का फिर से मूल्यांकन और उनकी नई व्याख्या करने की ज़रूरत है। ‘रंगलेयर रबी’ का वर्णन मशहूर अभिनेता, वाचक और इंटरडिसिप्लिनरी कलाकार सुजॉय प्रसाद चटर्जी ने किया। संगीत की प्रस्तुति प्रत्युष मुखोपाध्याय और प्रकृति मुखोपाध्याय ने दी, जिसमें सुरजीत दास और नीलांजन सेनगुप्ता ने वाद्ययंत्रों पर साथ दिया।

सुजॉय प्रसाद चटर्जी ने कहा, “यह प्रोडक्शन मेरे लिए एक तरह का टाइम ट्रैवल है। यह कला के समाजशास्त्रीय ढांचे में संस्कृति की राजनीति और उसमें टैगोर की अहम भूमिका को भी दर्शाता है।”

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