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फिल्म एक अधेड़ सुपरस्टार के कथित बलात्कार के आरोप में फंसने की कहानी को बिना किसी फिल्टर के डार्क अंदाज में दिखाती है.

फिल्म : बंदर रिव्यू

कलाकार -बॉबी देओल, सान्या मल्होत्रा, सपना पब्बी, सबा आजाद, इंद्रजीत सुकुमार, जीतेंद्र जोशी

4\5

फिल्म एक अधेड़ सुपरस्टार के कथित बलात्कार के आरोप में फंसने की कहानी को बिना किसी फिल्टर के डार्क अंदाज में दिखाती है.

बंदर’ की कहानी?
ये कहानी है समर मेहरा (बॉबी देओल) की. समर कोई आम आदमी नहीं है, वो अपने जमाने का एक बहुत बड़ा और चमचमाता हुआ सुपरस्टार हुआ करता था. आपको याद होगा, उसका एक दौर में सबसे बड़ा हिट गाना आया था, “कम ऑन बेबी दिल किसको देगी”. समर आज भी उसी पुराने दौर की खुमारी, पुरानी शोहरत और उस झूठी अकड़ को कसकर पकड़े बैठा है. यानी असल जिंदगी में वो ‘अरेस्टेड डेवलपमेंट’ का शिकार है. सीधे शब्दों में कहें तो वो उम्र से तो अधेड़ हो चुका है, लेकिन उसका दिमाग अभी भी बच्चों जैसा ही है, जो अपनी जिद से बाहर नहीं आ पाया है.

समर के घर का बूढ़ा नौकर उसे आज भी ‘बाबा’ कहकर पुकारता है. उसके बेड के बगल वाले नाइटस्टैंड पर उसकी पुरानी सुपरहिट फिल्म ‘बरसात’ के दिनों की तस्वीर सजी हुई है. वह अपने आलीशान घर में सुपरमैन वाले बॉक्सर पहनकर घूमता रहता है. लेकिन इस दिखावे के पीछे एक बड़ी शारीरिक लाचारी भी है. समर की रीढ़ की हड्डी में गंभीर दिक्कत है, जिसके कारण वह हमेशा एक बैक ब्रेस (कमर का पट्टा) पहनता है. फिल्म में ये पट्टा सिर्फ एक मेडिकल पट्टी नहीं है, बल्कि कश्यप ने इसका इस्तेमाल समर की रूह के रूप में किया है. ये दिखाता है कि इस बड़े से दिखने वाले मर्द के भीतर सचमुच की कोई रीढ़ की हड्डी बची ही नहीं है, वो अंदर से पूरी तरह खोखला और लाचार है.समर की इस दिखावे वाली मर्दानगी और आलीशान जिंदगी के गुब्बारे में पिन तब चुभती है, जब उस पर अचानक एक बेहद संगीन जुर्म, यानी यौन उत्पीड़न और बलात्कार का आरोप लगता है. समर ने वाकई ये गुनाह किया है या वह किसी बड़ी साजिश का शिकार हुआ है, ये जानने के लिए तो आपको थिएटर में जाकर ‘बंदर’ देखनी होगी.

निर्देशन और राइटिंग
फिल्म की शुरुआत यानी फर्स्ट हाफ थोड़ा अलग महसूस होता है. शायद निर्माता निखिल द्विवेदी के जुड़ने की वजह से फिल्म के शुरुआती हिस्से में थोड़ा कमर्शियल सिनेमा वाला फील आता है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, अनुराग कश्यप अपने असली और पुराने रंग में लौट आते हैं. फिल्म की राइटिंग में एक बड़ा ही दिलचस्प विरोधाभास देखने को मिलता है. जब समर को जेल भेज दिया जाता है, तो वहां की कंडीशन को कश्यप ने बिना किसी फिल्टर के दिखाया है. जेल के अंदर फैली गंदगी और टॉयलेट में फंसी इंसानी मल के शॉट्स दिखाने में डायरेक्टर ने जरा भी परहेज नहीं किया है. इन सीन्स को देखकर एक दर्शक के तौर पर आपके मन में अचानक एक अजीब सा सवाल कौंधता है, “क्या कोई भी आरोपी, चाहे उसका अपराध कितना भी बड़ा हो, इस तरह की बदतर और अमानवीय (Inhuman) सजा का हकदार है?”

यहीं पर राइटिंग की असली चालाकी सामने आती है. कश्यप ये बड़ा सवाल उठाते हैं कि क्या हमारे सिस्टम का ये गंदा चेहरा एक आरोपी के कथित अपराध से भी ज्यादा भयानक है? फिल्म में एक और कमाल का सीन है, एक तरफ 20 लोगों के बैरेट में 100-100 लोग रह रहे हैं, गंदा खाना खा रहे हैं और दूसरी तरफ इस जेल में सुबह-सुबह जेल के लाउडस्पीकर पर बजने वाले भक्ति गीत और मधुर भजन, मतलब इस तरह का अजीब सा मजाकिया विरोधाभास अनुराग कश्यप ही पैदा कर सकते हैं.

हालांकि, इतनी बेहतरीन पकड़ के बावजूद फिल्म अपने सबसे आखिरी हिस्से यानी क्लाइमेक्स में आकर थोड़ा लड़खड़ा जाती है. फिल्म खत्म होते वक्त स्क्रीन पर अचानक भारत में होने वाले फर्जी बलात्कार के मामलों के आंकड़े (टेक्स्ट स्लेट्स) दिखाए जाने लगते हैं. अब मेकर्स का इसके पीछे जो भी मकसद रहा हो, लेकिन आज के समय में जहां बच्ची और जानवरों को भी बक्शा नहीं जा रहा है, वहां फिल्म का ये मोड़ जबरन की गई कोशिश जैसा लगने लगता है. ये चीज फिल्म के के बेहद न्यूट्रल और सधे हुए स्टैंड को थोड़ा कमजोर कर देती है.

खुशी के रूप में सबा आजाद ने एक बेहद ‘सॉर्टेड’ और प्रैक्टिकल लड़की का रोल बखूबी निभाया है. वो उन लड़कियों में से नहीं है जो प्यार के अंधेपन में सब कुछ सहती रहें. जैसे ही सच और संगीन आरोप सामने आते हैं, वो बिना कोई वक्त गंवाए अपने कदम पीछे खींच लेती है. वहीं, सपना पब्बी ने पूर्व प्रेमिका गायत्री के किरदार में सस्पेंस, दर्द और पछतावे के तमाम शेड्स को बहुत ही खूबसूरती से पकड़ा है. बाकी किरदारों ने भी अपनी भूमिका को न्याय दिया है.

देखें या नहीं

‘बदर’ कोई पूरे परिवार के साथ बैठकर पॉपकॉर्न खाते हुए देखने वाली मनोरंजक फिल्म नहीं है. ये आपको बुरी तरह बेचैन करेगी. ये आपको उन मुद्दों पर सोचने और बात करने के लिए मजबूर करेगी, जिनसे हम अक्सर कतराते हैं.

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